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हमारे बारे में

धानुक समाज भारत का एक प्राचीन एवं परिश्रमी जातीय समुदाय है, जिसके सदस्य भारत के अनेक राज्यों के साथ-साथ नेपाल और बांग्लादेश में भी निवास करते हैं। मध्य प्रदेश एवं बुंदेलखंड क्षेत्र में हमारा समाज बंसकार / बंशकार नाम से भी जाना जाता है — दोनों नाम एक ही समाज की पहचान हैं। "धानुक" शब्द की उत्पत्ति "धनुष" से मानी जाती है, अर्थात धनुर्धर — परंपरा के अनुसार हमारे पूर्वज राजाओं की सेनाओं में कुशल धनुर्धर योद्धा रहे। वहीं "बंसकार" नाम बांस की कला से जुड़ा है — बांस से टोकरी, डलिया, सूप, पंखा जैसी उपयोगी वस्तुएँ बनाने की हमारी पुश्तैनी शिल्प-परंपरा सदियों पुरानी है। आज हमारा समाज शिक्षा, व्यवसाय, शासकीय सेवा और सामाजिक क्षेत्र में निरंतर आगे बढ़ रहा है। यह वेबसाइट समाज को संगठित करने और नई पीढ़ी को अपनी जड़ों से जोड़ने का एक विनम्र प्रयास है।

हमारा उद्देश्य

• समाज के सभी परिवारों को एक डिजिटल मंच पर जोड़ना और अद्यतन सदस्य निर्देशिका तैयार करना • समाज के भीतर योग्य वर-वधू के परिचय हेतु सुरक्षित एवं विश्वसनीय वैवाहिक सेवा उपलब्ध कराना • शिक्षा, छात्रवृत्ति, कैरियर मार्गदर्शन और प्रतिभा-सम्मान के कार्यक्रम चलाना • समाज के इतिहास, बांस शिल्प परंपरा और सांस्कृतिक धरोहर का दस्तावेज़ीकरण करना • सामाजिक कुरीतियों (दहेज, फिज़ूलखर्ची, नशा) के विरुद्ध जागरूकता फैलाना • ज़रूरतमंद परिवारों की सहायता हेतु सामुदायिक कोष एवं कल्याण योजनाएँ संचालित करना • समितियों के माध्यम से पारदर्शी और जवाबदेह सामाजिक नेतृत्व विकसित करना

हमारा दृष्टिकोण

एक ऐसा संगठित, शिक्षित और आत्मनिर्भर धानुक (बंसकार) समाज, जो अपनी सांस्कृतिक विरासत को सहेजते हुए राष्ट्र निर्माण में अग्रणी भूमिका निभाए।

समाज का परिचय

धानुक (बंसकार) समाज भारत के सबसे व्यापक रूप से फैले समुदायों में से एक है। हमारे समाज के लोग उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, बिहार, झारखंड, राजस्थान, हरियाणा, पंजाब, दिल्ली, पश्चिम बंगाल और त्रिपुरा सहित देश के अनेक राज्यों में तथा नेपाल के तराई क्षेत्र (सप्तरी, सिरहा, धनुषा) और बांग्लादेश में भी निवास करते हैं। भारत में धानुक समाज की जनसंख्या अनुमानतः 44 लाख से अधिक है; सामाजिक संगठनों के अनुसार सभी सहवर्ती नामों-समुदायों को मिलाकर यह संख्या और भी अधिक आँकी जाती है। क्षेत्र के अनुसार हमारा समाज अनेक नामों से जाना जाता है — धानुक, धानक, धनका, धनकिया, बंसकार, बंशकार, बांसकार, बसोड़, बांसफोड़, जुलाहा, बुनकर, वणकर, कबीरपंथी, भगत, बरार, बरगी, कठेरिया, तड़वी, टटेरिया, राउत, हलपति आदि — किंतु मूल पहचान, परंपराएँ और सामाजिक ताना-बाना एक ही है। राष्ट्रीय स्तर के धानक सामाजिक संगठन भी बंसकार, बसोड़ और बांसफोड़ को धानक-धानुक परिवार के ही नाम मानते हैं। इसीलिए हमारे समाज को "बावन रूपी समाज" भी कहा जाता है — एक ही मूल, बावन रूप। पारंपरिक व्यवसाय — श्रम और कला की विरासत हमारे समाज के परंपरागत व्यवसाय सदैव स्वच्छ, कलात्मक और श्रम-आधारित रहे हैं — वस्त्र बुनाई (जुलाहा परंपरा), बांस शिल्प (टोकरी, डलिया, सूप, चटाई), बेंत व जूट का फ़र्नीचर, दरी निर्माण, भवन-निर्माण (राजमिस्त्री) कार्य, अनाज छँटाई, भेड़-बकरी-ऊँट-घोड़ों का पालन, बैंड-बाजा एवं शास्त्रीय वाद्य कला, फूल निर्माण व सजावट, और कृषि। समय के साथ समाज की नई पीढ़ी इंजीनियरिंग, तकनीकी और व्यावसायिक शिक्षा के क्षेत्रों में तेज़ी से आगे बढ़ रही है — यही हमारी परंपरा है: हर युग में हुनर, हर युग में परिश्रम। नाम की उत्पत्ति • धानुक: यह नाम "धनुष" से बना है। परंपरागत मान्यता के अनुसार हमारे पूर्वज कुशल धनुर्धर थे, जो राजा-महाराजाओं की सेनाओं में सेवा देते थे। प्राचीन साहित्य में भी धानुक योद्धाओं का उल्लेख मिलता है। • बंसकार / बंशकार: इसका शाब्दिक अर्थ है "बांस का काम करने वाला"। समय के साथ जब समाज के अनेक परिवार बांस शिल्प — टोकरी, डलिया, सूप, छबड़ी, पंखा, दउरी आदि बनाने — से जुड़े, तो मध्य प्रदेश एवं बुंदेलखंड में यह नाम प्रचलित हुआ। यह नाम हमारी कारीगरी और श्रम-साधना का प्रतीक है। इस प्रकार धानुक और बंसकार — दोनों नाम हमारे समाज की दो गौरवशाली परंपराओं को दर्शाते हैं: शौर्य (धनुर्विद्या) और शिल्प (बांस कला)। सामाजिक एवं संवैधानिक स्थिति भारतीय संविधान के अंतर्गत धानुक समाज को उत्तर प्रदेश, पंजाब, हिमाचल प्रदेश, राजस्थान, मध्य प्रदेश, चंडीगढ़ और दिल्ली में अनुसूचित जाति (SC) का दर्जा प्राप्त है, जबकि कुछ राज्यों में समाज ओबीसी वर्ग में सम्मिलित है और मध्य प्रदेश में 1978 से धानुक को अनुसूचित जनजाति वर्ग में भी स्थान मिला है। (नोट: आरक्षण की स्थिति राज्य-अनुसार भिन्न है — अपने राज्य/जिले की आधिकारिक सूची अवश्य देखें।) संस्कृति एवं परंपराएँ हमारा समाज सनातन परंपराओं का अनुयायी है। होली, दीपावली, नवरात्रि, रक्षाबंधन और रामनवमी हमारे प्रमुख पर्व हैं। विवाह-संस्कार समाज के भीतर, गोत्र-बहिष्कार (सगोत्र विवाह वर्जित) की परंपरा के अनुसार संपन्न होते हैं। सामूहिक भोज, समाज पंचायत और सामुदायिक सहयोग हमारी सामाजिक व्यवस्था के आधार-स्तंभ रहे हैं। आज का समाज आज धानुक (बंसकार) समाज परिवर्तन के दौर से गुजर रहा है। पारंपरिक व्यवसायों के साथ-साथ हमारी नई पीढ़ी शिक्षा, शासकीय सेवा, व्यापार, तकनीक और राजनीति में अपनी पहचान बना रही है। समाज के सामने आज तीन बड़े लक्ष्य हैं: शिक्षा — हर बच्चे तक गुणवत्तापूर्ण शिक्षा पहुँचे संगठन — बिखरे हुए समाज को एक मंच पर लाना सम्मान — अपनी विरासत पर गर्व करते हुए आधुनिक भारत में बराबरी का स्थान यही तीन लक्ष्य इस वेबसाइट की आत्मा हैं।

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